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कविता जो करती है व्यक्त, अव्यक्त भावों को बड़ी सहजता से, जो खोलती है राह नित नयी और करती है मजबूर कुछ कह जाने को

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Poetry Blog


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Republic Day Special: वीर तुम बढ़े चलो

Posted On: 24 Jan, 2014  
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Hindi Sahitya में

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क्यों हैं इतने बेबस?

Posted On: 23 Jan, 2014  
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Hindi Sahitya में

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उनको देखने से.​..​

Posted On: 27 Dec, 2013  
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कविता में

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जावेद अख्तर: हर ख़ुशी में कोई कमी सी है

Posted On: 20 Dec, 2013  
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Others में

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मिर्जा ग़ालिब की शायरी: कोई उम्मीद बर नहीं आती

Posted On: 4 Dec, 2013  
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कविता में

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children’s day special : बाल दिवस

Posted On: 14 Nov, 2013  
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कविता में

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महादेवी वर्मा की कविताएं: मुरझाया फूल

Posted On: 22 Sep, 2013  
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गुलजार की कविताएं: कुछ साये, कुछ परछाइयां

Posted On: 15 Sep, 2013  
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कविता में

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हरिवंश राय बच्चन की कविताएं: जो बीत गई सो बात गई

Posted On: 12 Sep, 2013  
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Hindi Sahitya में

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महादेवी वर्मा की कविताएं: मैं नीर भरी दुख की बदली

Posted On: 11 Sep, 2013  
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Hindi Sahitya में

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आपका कहना सही है शकुंतला जी. हमें खुशी है कि आपको हमारा ब्लॉग पसंद आया. हमें एक आजाद राष्ट्र का गौरव देने के लिए बिस्मिल जी और जाने कितने देशभक्तों ने खुशी-खुशी अपने प्राणों की अहुति दे दी. जिसके लिए हमे हमेशा उनके ऋणी रहेंगे. इतनी शहादतों से मिली आजादी को भ्रष्टाचार में डूबते देख दुख होता है. हमें खुशी है कि आपको हमारा ब्लॉग पसंद आया. हमारा यह ब्लॉग हिंदी भाषी कविता प्रेमियों को समर्पित है. साथ ही हम इसके द्वारा नई पीढी को हमारी समृद्ध कवि और कविताओं के संसार से रूबरू भी करवाना चाहते हैं जो फिल्मी गानों के शोर में कहीं लुप्त हो गया सा लगता है. अभी शुरुआत में हम इसे श्रृंखलाबद्ध नहीं कर पा रहे हैं पर जल्द ही हम इसे श्रृंखलाबद्ध और नियमित कर देंगे. उम्मीद है हमारा यह प्रयास सही दिशा में है.

के द्वारा: Poetry Blog Poetry Blog

एक कुतता सड़क पर अकड़ा खड़ा है .जागरूकता का लिए परिचय अड़ा है. कह रहा है राहगीरों सॆ बताऒ राष्ट् या धृतराष्ट् का बेटा बड़ा है . और फिर वह पृश्न करता जा रहा है . सारी सच्चाई चुगलता जा रहा है . व्यवस्था से पूंछता है तुम बताऒ . नीति या नेता यहॉ सबसे बड़ा है . दुम हिलाकर पृश्न सूचक दृष्टि करता कुनकुनाता और कहता देश क्यों अब विश्व की आंखों चढ़ा है . सन्देह उसका वलवती होता सड़क पर देख पत्थर बरस पड़ते सड़क पर  चोट खाया ,टॉग टूटी फिर घिसट कर कह रहा है कौन है जयचन्द जो पीछे खड़ा है . पृश्न वह उस सड़क पर ही छोड़कर ही जा रहा है .व्यवस्था का काफिला किस मोड़ पर मॅड़रा रहा है . खेद है कि बुध्दि पृज्ञा का दमन इतना हुआ . चेतना की चूक या सम्मान ही उससे बड़ा है।

के द्वारा:

सर आपका ब्लॉग हमें पसंद आया . सर आपसे अक मदद की गुजारिश hai की मै भी एक lakhika हु or अपनी कविता जागरण काव्य मंच मै प्रकाशित करना चाहती हु पर mujhe iski rah nahi pata kya ap मुजे rah dikh लायेंगे? मुल्ला कहे पन्डित से राम राम पन्डित कहे मुल्ला से वालेकुम अस्लाम चन्द सिक्को की खातिर इन समाज के टेकेदारो ने भाई को भाई से लडवाया मजहबी कायनाती सलाहकारो ने हिन्दु भाई ने मा कहा मुस्लिम भाई ने अम्मा अर्थ हॆ वही तरीका हॆ बदला जातिवाद का ढोल बजाते सत्ता की गलियारो मे जातिवाद पनपता हॆ इन्ही नेताशाही रियासती नुमांइदो में आग लगा कर दौडे लेने पानी इन नेताओ की यही कहानी मत मिलने दो भाई भाई को वरना गजब हो जायेगा तख्तो ताज पलट देगे दो ही दिन मे तुम्हारा धंधा ठ्प्प हो जायेगा दिखला देगे हम सब को देश प्रेम की यह सौगात देश की उन्नती और प्रगती मे देना हॆ हमे बडे बलिदान आवश्यकता हॆ आविश्कार की जननी दिखलाना हॆ करके देह दान रक्तदान यह समझ नही पाते नेत्रदान यह कर नही पाते बेईमानी हॆ इन की शान जनता से धोखा ओर फ़रेब से बढता हॆ इनका मान और सम्मान इशु कहे खुदा से इन्हें सद्बुध्दि देना भगवान सर ye mere dwara rachit कविता है जवाब क इंतजार मै laxmi joshi "ishu"

के द्वारा:




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